Poème n°28

कहीं मट्टी उछलती है, कहीं कंकर छिटकता है।
कि ठुड्डे मारती चलती हैं राहों में हवाएँ
अजब लड़कों सी लगती हैं ये दोशीज़ा अदाएं!