Poème n°27
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रोज़ उठ कर चाँद टाँगा है फ़लक पे रात को रोज़ दिन की रोशनी में रात तक आया किये |
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| हाथ भर के फ़ासले को उम्र भर चलना पड़ा। |
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रोज़ उठ कर चाँद टाँगा है फ़लक पे रात को रोज़ दिन की रोशनी में रात तक आया किये |
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| हाथ भर के फ़ासले को उम्र भर चलना पड़ा। |