Poème n°25
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न हर सहर का वो झगड़ा, न शब की बेचैनी न चूल्हा जलता है घर में न आँखें जलती हैं |
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| में कितने अमन से घर में उदास रहता हूँ। |
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न हर सहर का वो झगड़ा, न शब की बेचैनी न चूल्हा जलता है घर में न आँखें जलती हैं |
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| में कितने अमन से घर में उदास रहता हूँ। |