Poème n°24
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कोई चादर की तरह खींचे चला है दरिया कौन सोया है तले इसके जिसे ढूँढ रहे हैं! |
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| डूबने वाले को भी चैन से सोने नहीं देते! |
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कोई चादर की तरह खींचे चला है दरिया कौन सोया है तले इसके जिसे ढूँढ रहे हैं! |
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| डूबने वाले को भी चैन से सोने नहीं देते! |