Poème n°21
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शाम गुज़री है बहुत पास से होकर लेकिन सर पे मंडराती हुई रात से जी डरता है |
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| सर चढ़े दिन की इसी बात से जी डरता है। |
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शाम गुज़री है बहुत पास से होकर लेकिन सर पे मंडराती हुई रात से जी डरता है |
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| सर चढ़े दिन की इसी बात से जी डरता है। |