वाराणसी

बनारस

अजनबियों से मिलना…

हम अपने आपको इतने फ़न-ए-खान समझते हैं लेकिन बनारस में जाकर…

कि कमबख़्त समझ जाता है मैंने काफ़ी जद-ओ-जेहद के बाद इस कविता का नाम बनारस रख दिया है, और कोई नाम हो भी नहीं सकता था। इसके तीन parts हैं, मानो छोटी-छोटी तीन miniature कहानियाँ या कविताएँ हों…

मुलाहिज़ा फ़रमाइये…


Source : Vineet KKN ‘Panchhi’

Poème n°1 : बनारस में Reebok का जूता

बनारस में Reebok का जूता
पैर जैसे ही गाए के गोबर पे पड़ा
सफ़ेद Reebok के जूते की उम्र और कीमत, दोनों याद आ गए
पर गली के भिखमंगे बच्चों ने समझाया
Uncle, परेशान न होइये
दूसरे जूते को भी गोबर में डुबोइये
अब दोनों एक ही रंग के हो जाएंगे
न आपकी आँखों को खलेंगे
न कीमत याद दिलाएंगे
और तब भी आपको जूता अजीब लगे
तो हमें दे दीजियेगा
हम इसे गंगा-मैया में धोके ले आएंगे
हमारे पाँव ज़माने से नंगे हैं
इस बहाने हम भी जूता पहन पाएंगे

Poème n°2 : बनारस का मदारी

बनारस का मदारी
बंदर-बंदरिया का खेल रोज़ चलता है
बंदरिया आगे ज़्यादातर कभी
कभी बंदर भी चलता है
बंदर-बंदरिया का नाच घाट प रोज़ चलता है
बंदरिया आगे ज़्यादातर कभी
कभी बंदर भी चलता है
मदारी की आवाज़ सुनते ही दोनों जमके dance करते हैं
कभी बंदर पिस्तौल उठाता है
कभी couple बनके romance करते हैं
मैंने जाने क्यों मदारी को समझाया
जानवर के साथ ऐसा क्यों करते हो, भाई?
आज़ाद कर दो इन्हें!
सारा दिन क्यों बाँधे रखते हो, भाई?
आज़ाद कर दो इन्हें!
मदारी मुझसे ज़्यादा पका हुआ सयाना था
झुर्रियाँ बताती थीं, देखा इसने ज़माना था
बोला, बाबू, नौकरी-पेशा लगते हो
Office से कितने दिन की छुट्टी मिली है?
हमारे बंदर की चिन्ता है
अपने मदारी से क्यों नहीं बात करते हो?

Poème n°3 : बनारस का साधु

बनारस का साधु
खाट पे बैठे एक साधु से पूछा
क्यों, बाबा, क्या कुछ वेद-शेद जानते हो या यूँ ही पाखंड करते हो?
किस अखाड़े के हो? कौन है गुरु तुम्हारा?
कुछ धर्म के बारे में आता-जाता है
या यूं ही public को झंड करते हो
साधु बड़ी देर शायद लेटा था
आँखें पूरी खोली, ली जमाही
पीछे से चिलम निकाली, माल डाला, चिलम जलाई
बोला, बैठो, अभी जवाब देते हैं
एक-आद सवाल हमारा भी है,
तुम जवाब देनेवाले बनो, हम भी देते हैं
साधु बोला, बेटा, जितना ख़ुद को अक्लमन्द, पढ़ा-लिखा बताते हो
सच बताओ, life में जो कहते हो, सब कर पाते हो?
मुस्कुराके बोला, जिस दिन मेरे साथ बैठकर सच बोल पाओगे, समझ जाओगे
ये ज़िन्दगी है, बेटा, जिस दिन ये बेकार के सवाल बन्द कर दोगे,
जवाब ख़ुद-ब-ख़ुद सुन पाओगे