La fumée

Sampooran Singh Gulzar
धुंआ

Site de Sampooran Singh Gulzar (né le 18 août 1936)

Texte en hindi de la nouvelle

धुंआ La fumée
Sampooran Singh Gulzar Traduction : Sakina Safy
बात सुलगी तो बहुत धीरे से थी, लेकिन देखते ही देखते पूरे कस्बे में “धुंआ” भर गया। चौधरी की मौत सुबह चार बजे हुई थी। सात बजे तक चौधराइन ने रो-धो कर होश संभाले और सबसे पहले मुल्ला खैरूद्दीन को बुलाया और नौकर को सख़्त ताकीद की कि कोई ज़िक्र न करे। नौकर जब मुल्ला को आंगन में छोड़ कर चला गया तो चौधराइन मुल्ला को ऊपर ख़्वाबगाह में ले गई जहाँ चौधरी की लाश बिस्तर से उतर कर ज़मीन पर बिछा दी गई थी। दो सफ़ेद चादरों के बीच लेटा एक ज़रदी मायल सफ़ेद चेहरा, सफ़ेद भौवें, दाढ़ी और लंबे सफ़ेद बाल। चौधरी का चेहरा बड़ा नूरानी लग रहा था।
मुल्ला ने देखते ही ‘एन्नल्लाहे व इना अलेहे राजेउन’ पढ़ा, कुछ रसमी से जुमले कहे। अभी ठीक से बैठा भी न था कि चौधराइन अलमारी से वसीयतनामा निकाल लाई, मुल्ला को दिखाया और पढ़ाया भी। चौधरी की आख़िरी खुवाहिश थी कि उन्हें दफ़न के बजाय चिता पर रख के जलाया जाय और उनकी राख को गाँव की नदी में बहा दिया जाय, जो उनकी ज़मीन सींचती है।
मुल्ला पढ़ के चुप रहा। चौधरी ने दीन मज़हब के लिये बड़े काम किये थे गांव में। हिन्दू-मुसलमान को एकसा दान देते थे। गांव में कच्ची मस्जिद पक्की करवा दी थी। और तो और हिन्दुओं के शमशान की इमारत भी पक्की करवाई थी। अब कई वर्षों से बीमार पड़े थे लेकिन इस बीमारी के दौरान भी हर रमज़ान में गरीब गुरबा की अफ़गारी (अफ़तारी) इन्तज़ाम मस्जिद में उन्हीं की तरफ़ से दुआ करता था। इलाके के मुसलमान बड़े भक्त थे उनके बड़ा अकीदा था उन पर और अब वसीयत पढ़ के बड़ी हैरत हुई मुल्ला को कहीं झमेला न खड़ा हो जाए। आजकल वैसे ही मुल्क की फ़िज़ा खराब हो रही थी हिन्दू कुछ ज़्यादा ही हिन्दू हो गए थे मुसलमान कुछ ज़्यादा मुसलमान !
चौधराइन ने कहा, मैं कोई पाठ पूजा नहीं करवाना चाहती। बस इतना चाहती हूँ कि शमशान में उन्हें जलाने का इतज़ाम कर दीजिये। मैं रामचन्द्र पंडित को भी बता सकती थी लेकिन इस लिये नहीं बुलाया कि बात कहीं बिगड़ न जाए।
बात बताने ही से बिगड़ गई जब मुल्ला खैरूद्दीन ने मस्लहतन पंडित रामचंद को बुलाकर समझाया कि -
“तुम चौधरी को अपने शमशान में जलाने की इजाज़त न देना वरना हो सकता है, इलाके के मुसलमान बावेला खड़ा कर दें। आख़िर चौधरी आम आदामी तो था नहीं, बहुत से लोग बहुत तरह से उनसे जुड़े हुए हैं।”
पंडित रामचंद्र ने भी यक़ीन दिलाया कि वह किसी तरह की शर अंग्रेज़ी अपने इलाके में नहीं चाहते। इससे पहले कि बात फैले वह भी अपनी तरफ़ के मखसूस लोगों को समझा देंगे।
बात जो सुलग गई थी धीरे-धीरे आग पकड़ने लगी। सवाल चौधरी और चौधराइन का नहीं है सवाल अकीदों का है। सारी कौम सारी कम्यूनिटि और मज़हब का है। चौधराइन की हिम्मत कैसे हुई कि वह अपने शौहर को दफ़न करने की बजाय जलाने पर तैयार हो गई। वह क्या इसलाम के आईन नहीं जानती ?
कुछ लोगों ने चौधराइने से मिलने की भी ज़िद की। चौधराइन ने बड़े धीरज से कहा - “भाइयों ! ऐसी उनकी आख़िरी ख़्वाहिश थी। मिट्टी ही तो है, अब जला दो या दफ़न कर दो, जलाने से उनकी रूह को तस्कीन मिले तो आपको ऐतराज़ हो सकता है ?”
एक साहब कुछ ज़्यादा तैश में आ गये। बोले -
“इन्हें जलाकर क्या आपको तक्सीन होगी ?”
“जी हाँ” चौधराइन का जवाब बहुत मुख़्तसर था।”
“उनकी आख़री ख़्वाहिश पूरी करने से ही मुझे तस्कीन होगी।”
दिन चढ़ते-चढ़ते चौधराइन की बेचैनी बढ़ने लगी। जिस बात को वह सुलह सफ़ाई से निपटना चाहती थी वह तूल पकड़ने लगी। चौधरी साहब की इस ख़्वाहिश के पीछे कोई पेचीदा प्लाट, कहानी या राज़ की बात नहीं थी। न ही कोई ऐसा फ़लसफ़ा था जो किसी दीन मज़हब या अकीदे से जुड़ता हो। एक सीधी-सादी इन्सानी ख़्वाहिश थी कि मरने के बाद मेरा कोई नाम व निशान न रहे।
“जब हूं तो हूं, जब नहीं हूं तो कहीं नहीं हूं।”
बरसों पहले यह बात बीवी से हुई थी, पर जीते जी कहाँ कोई ऐसी तफ़सील में झांक कर देखता है। और यह बात उस ख़्वाहिश को पूरा करना चौधराइन की मुहब्बत और भरोसे का सुबूत था। यह क्या कि आदमी आंख से ओझल हुआ और आप तमाम ओहदो पैमान भूल गये।
चौधराइन ने एक बार बीरु को भेजकर रामचंद्र पंडित को बुलाने की कोशिश भी की थी लेकिन पंडित मिला ही नहीं। उसके चौकीदार ने कहा -
“देखो भाई, हम जलाने से पहले मंत्र पढ़के चौधरी को तिलक ज़रूर लगाएंगे।”
“अरे भाई, जो मर चुका उसका धर्म अब कैसे बदलेगा ?”
“तुम ज़्यादा बहस तो करो नहीं। यह हो नहीं सकता कि गीता के श्लोक पढ़े बगैर हम किसीको मुख अग्नि दें। ऐसा न करें तो आत्मा हम सब को सताएगी, तुम्हें भी, हमें भी। चौधरी साहिब के हम पर बहुत एहसान हैं। हम उनकी आत्मा के साथ ऐसा नहीं कर सकते।”
बीरू लौट गया।
बीरु जब पंडित के घर से निकल रहा था तो पन्ना ने देख लिया। पन्ना ने जाकर मस्जिद में ख़बर कर दी।
आग तो घुट-घुट कर ठण्डी होने लगी थी, फिर से भड़क उठी। चार-पांच मुअतबिर मुसलमानों ने तो अपना कतई फ़ैसला भी सुना दिया। उन पर चौधरी के बहुत एहसान थे वह उनकी रूह को भटकने नहीं देंगे। मस्जिद के पिछवाड़े वाले किब्रिस्तान में, कब्र खोदने का हुक़्म भी दे दिया।
शाम होते-होते कुछ लोग फिर हवेली पर आ धमके। उन्होंने फ़ैसला कर लिया था कि चौधराइन को डरा धमका कर, चौधरी का वसीयतनामा उससे हासिल कर लिया जाए और जला दिया जाए फिर वसीयतनामा ही नहीं रहेगा तो बुढ़ीया क्या कर लेगी।
चौधराइन ने शायद यह बात सूंघ ली थी। वसीयतनामा तो उसने कहीं छुपा दिया था और जब लोगों ने डराने धमकाने की कोशिश की तो उसने कह दिया -
“मुल्ला खैरूद्दीन से पूछ लो, उसने वसीयत देखी है और पूरी पढ़ी है।”
“और अगर वह इनकार कर दे तो ?”
“कुरान शरीफ़ पर हाथ रख के इनकार कर दे तो दिखा दूंगी, वरना…”
“वरना क्या ?”
“वरना कचहरी में देखना।”
बात कचहरी तक जा सकती है, यह भी वाज़े हो गया। हो सकता है चौधराइन शहर से अपने वकील को और पुलिस को बुला ले। पुलिस को बुला कर उनकी हाज़री में अपने इरादे पर अमल कर ले। और क्या पता वह अब तक उन्हें बुला भी चुकी हों। वरना शौहर की लाश बर्फ़ की सिलों पर रखकर कोई कैसे इतनी ख़ुद एतमादी से बात कर सकता है।
रात के वक़्त ख़बरे आफ़वाहों की रफ़्तार से उड़ती है। किसी ने कहा -
“एक घुड़सवार अभी-अभी शहर की तरफ़ जाते हुए देखा गया है। घुड़सवार ने सर और मुँह साफ़े से ढांप रखा था, और वह चौधरी की हवेली से ही आ रहा था।”
एक ने तो उसे चौधरी के अस्तबल से निकलते हुए भी देखा था।
ख़ादू का कहना था कि उसने हवेली के पिछ्ले अहाते में सिर्फ़ लड़कियां काटने की आवाज़ ही नहीं सुनी, बल्कि पेड़ गिरते हुए भी देखा है।
चौधराइन यक़ीनन पिछले अहाते में चिता लगवाने का इन्तज़ाम कर रही हैं। कल्लू का ख़ून खौल उठा।
“बुज़दिलो - आज रात एक मुसलमान को चिता पर जलाया जाएगा और तुम सब यहाँ बैठे आग की लपटें देखोगे।”
कल्लू अपने अड्डे से बाहर निकला। ख़ून ख़राबा उसका पेशा है तो क्या हुआ ? ईमान भी तो कोई चीज़ है।
“ईमान से अज़ीज़ तो माँ भी नहीं होती, यारो।”
चार पांच साथियों को लेकर कल्लू पिछ्ली दीवार से हवेली पर चढ़ गया। बुढ़िया अकेली बैठी थी लाश के पास। चौंकने से पहले ही कल्लू की कुल्हाड़ी सर से गुज़र गई।
चौधरी की लाश को उठवाया और मस्जिद के पिछवाड़े ले गए, जहाँ उसकी कब्र तैयार थी। जाते-जाते रमज़े ने पूछा -
“सुबह चौधराइन की लाश मिलेगी तो क्या होगा ?”
“बुढ़िया मर गई क्या ?”
“सर तो फट गया था, सुबह तक क्या बचेगी ?”
कल्लू रुका और देखा चौधराइन की ख़्वाबगाह की तरफ़। पन्ना कल्लू के जिगरे की बात समझ गया।
“तू चल उस्ताद, तेरा जिगर क्या सोच रहा है, मैं जानता हूँ। सब इन्तज़ाम हो जाएगा।”
कल्लू निकल गया कब्रिस्तान की तरफ़।
रात जब चौधारी की ख़्वाबगाह से आसमान छूती लपटें निकल रही थीं तो सारा कस्बा धुएं से भरा हुआ था।
ज़िन्दा जला दिये गए थे,
और मुर्दे दफ़न हो चुके थे।