L’empereur Akbar et son vizir Birbal
बारह में चार निकले तो…

बारह में चार निकले तो… Si on retranchait 4 de 12, alors…
  Traduction : Véronique Pollot
अकबर ने अपने दरबारियों से सवाल किया- “बारह में चार निकल गए, क्या बचा ?” Akbar posa le problème suivant à ses sujets : « Si on retranchait 4 de 12, que resterait-il ? »
सभी दरबारियों ने एकमत होकर कहा- “जहांपनाह आठ बचे।” Après concertation, tous les sujets, unanimes, dirent : « Ô Protecteur du monde, il reste 8. »
बादशाह अकबर इस जवाब से सहमत न थे। उन्हें उम्मीद थी कि इसका जवाब बीरबल से ही मिलेगा, वे हसरत भरी नजरों से बीरबल को देखने लगे। L’empereur Akbar fut en désaccord avec cette réponse. Il espérait que seul Birbal trouverait la réponse à cette question. Il commença à regarder Birbal, en attente.
बीरबल ने कहा- “जहांपनाह, बारह में से चार निकलने पर कुछ नहीं बचा।” Birbal dit : « Ô Protecteur du monde, si on retranche 4 de 12, il ne reste rien. »
“वह कैसे?” अकबर ने पूछा। « Comment cela ? » demanda Akbar.
“हुजूर, एक वर्ष में बारह माह होते हैं और इनमें चार माह गर्मी के, चार सर्दी के तथा चार बरसात के होते हैं। यदि इनमें से बरसात के चार माह निकाल दिए जाएं तो कुछ भी नहीं बचेगा। क्योंकि बरसात न होने से पानी नहीं मिलेगा… पानी नहीं होगा तो खेती सूख जाएगी… और तब बचने को रह क्या जाएगा?” « Votre Excellence, dans une année, il y a 12 mois, dont 4 mois d’été, 4 mois d’hiver et 4 mois de mousson. Si on retranchait les 4 mois de mousson, alors il ne resterait rien. Car, sans pluie, pas d’eau… sans eau, l’agriculture souffrira de sécheresse… alors que restera-t-il enfin ?
बीरबल के जवाब से प्रसन्न हो गए बादशाह अकबर। La réponse de Birbal plut à l’Empereur Akbar.